अंग्रेजी हुकूमत के ताबूत का पहला कील - जालियांवाला नरसंहार!
अप्रैल 1919 का नरसंहार कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी घटना थी जो इतिहास में होने वाले अनेक कारणों के परिणामस्वरूप घटित हुई थी। 13 अप्रैल 1919 को क्या हुआ? यह समझने के लिए इससे पहले की घटनाओं के बारे में जानना भी जरूरी है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह मान लिया था कि प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होने के पश्चात् देश को स्व-शासन की अनुमति दे दी जाएगी, किंतु शाही अधिकारी-तंत्र की कुछ और ही योजना थी।
रॉलट कानून (काला अधिनियम) 10 मार्च 1919 को पारित किया गया था, जिसमें सरकार को, देशद्रोही गतिविधियों से जुड़े किसी भी व्यक्ति को, उसपर बिना मुकदमा चलाए, कारावास में डालने या कैद करने के लिए अधिकृत किया गया था। इस कानून के आने से देशव्यापी अशांति फैल गई।
रॉलट कानून का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी ने सत्याग्रह शुरू किया और 7 अप्रैल 1919 को गांधी ने रॉलट कानून का विरोध करने के तरीकों का वर्णन करते हुए 'सत्याग्रही' नामक एक लेख प्रकाशित किया। इससे बौखलाते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने गांधी और सत्याग्रह में भाग लेने वाले अन्य नेताओं के विरुद्ध कार्यवाहियों करने के लिए योजना तैयार कर ली।
9 अप्रैल, 1919, को जब रामनवमी मनाई जा रही थी, तब उप–गवर्नर ओड्वायर ने अपने उपायुक्त इरविंग को, इस आंदोलन से जुड़े दो नेता डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया।
हालांकि वे जानते थे कि इस तरह के कृत्य के परिणामस्वरूप सार्वजनिक विरोद्ध होगा। वे यह भी जानते थे कि इन लोकप्रिय नेताओं में से कोई भी हिंसा का पक्षधर नहीं था। इसलिए, एक षड्यंत्र के तहत उसने 10 अप्रैल की सुबह दोनों सज्जनों को अपने घर आमंत्रित किया। डॉ. सत्यपाल और डॉ. किचलू ने गवर्नर पर भरोसा करते हुए, बिना किसी तरह की आशंका के उनके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। लेकिन जब वे अतिथियों के रूप में उनके घर पहुंचे तो उसके कुछ ही देर में उन्हें पकड़ लिया गया और पुलिस अनुरक्षकों की निगरानी में धर्मशाला की ओर भेज दिया गया।
11 अप्रैल 1919 को अपने दो नेताओं को रिहा करने की माँग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने उपायुक्त के आवास तक जुलूस निकाला। यहाँ उनकी तरफ से कोई उकसावा नहीं होने के बावजूद भी उनपर गोलियाँ चलाई गईं। इस गोलीबारी में कई लोग घायल हुए और कुछ शहीद भी हुए। प्रदर्शनकारियों ने अपने बचाव में लाठियों और पत्थरों का प्रयोग करते हुए भाग निकले। इस घटना के बाद पूरे शहर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।
नरसंहार
बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में रॉलेट एक्ट के विरुद्ध, अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध व अंग्रेजी हुकूमत से भारतीय नेताओं को रिहा करने के अनुरोध में एक जनसभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। 10 अप्रैल के गोलीकांड के बाद शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था। फिर भी इस सभा में सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। उस दिन करीब 5,000 लोग जलियाँवाला बाग में एकत्रित हुए थे।
ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी परिस्थिति लग रही थी, जिसे रोकने के लिए और कुचलने के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार थे।
जब क्रांतिकारी नेता बाग़ में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर अपने 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। जनरल डायर के आदेश पर सैनिकों ने बाग़ को घेर लिया और बिना कोई चेतावनी दिए, निहत्थे लोगों पर गोलियाँ बरसानी शुरु कर दी। रिकॉर्ड्स के मुताबिक १० मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं।
उन दिनों जलियाँवाला बाग़ मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहां तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। मुख्य द्वार को अंग्रेज सैनिकों ने घेर रखा था और भागने का दूसरा कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर निरंकुश डायर ने कुएं में भी गोलियां चलवाई और देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया।
बच्चे, बूढ़े, जवान, महिला, अपंग सहित हजारों लोग उस दिन मातृभूमि के लिए शहीद हुए। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियाँवाला बाग़ में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जबकि अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।
नरसंहार के दो दिन बाद पाँच क्षेत्रों- लाहौर, अमृतसर, गुजरांवाला, गुजरात और लायलपुर में सैनिक शासन लागू कर दिया गया। सैनिक शासन की घोषणा द्वारा गवर्नर-जनरल को, क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल किसी भी व्यक्ति के ऊपर कोर्ट-मार्शल द्वारा तत्काल मुकदमा चलाने का अधिकार दिया गया। इस घटना का समाचार फैलते ही पूरे भारत में अंग्रेजी हुकूमत का विरोध शुरू हो गया। हर कोई अपने स्तर से इसका विरोध करने लगे। गुरु रविंद्र नाथ टैगोर ने विरोध में अपने नाइटेंगल की उपाधि लौटा दी।
14 अक्टूबर 1919 को इस पूरे घटनाक्रम की जाँच-पड़ताल करने के लिए एक जाँच समिति का गठन किया गया। इसे बाद में हंटर आयोग के नाम से जाना गया।
हंटर आयोग को सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के औचित्य या अनौचित्य पर अपना निर्णय देने के लिए निर्देशित किया गया था। अमृतसर में गड़बड़ी के दौरान प्रशासन में शामिल जनरल डायर और इरविंग सहित सभी ब्रिटिश अधिकारियों से पूछताछ की गई। पूछताछ में जनरल डायर ने बताया की नरसंहार के दिन गोली चलाने के कार्यवाही को ‘सर माइकल ओड्वायर’ की ओर से स्वीकृति मिली थी। ओडवायर ने जनरल डायर को तार के माध्यम से कहा की– "आपकी कार्यवाही सही है। राज्यपाल इसका अनुमोदन करते हैं।”
जनरल डायर ने हंटर आयोग के सामने जो सबूत पेश किया, वह उसके द्वारा किए गए क्रूर कृत्य का स्वीकरण था। समिति ने इस नरसंहार को ब्रिटिश प्रशासन के सबसे काले प्रकरणों में से एक के रूप में इंगित किया।
जालियांवाला बाग के प्रतिशोध स्वरूप 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में ‘शहीद ऊधम सिंह जी’ ने इस नरसंहार के मुख्य योजनाकार माइकल ओड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी।
उस वक्त गांधी ने ऊधम सिंह की कार्यवाही का खंडन किया और इसे पागलपन का कार्य बताया। गांधी ने कहा, “हमें बदला लेने की कोई इच्छा और आवश्यकता नहीं है। हम उस प्रणाली को बदलना चाहते हैं जिसने डायर को जन्म दिया।”
इस प्रकार से, जलियाँवाला बाग नरसंहार भारत को स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली आरंभिक चिंगारी थी। यह पीड़ितों और औपनिवेशिक शासकों, दोनों के लिए ही एक दुखद घटना थी। इसने अंग्रेज़ों की धारणाओं और रवैये में घातक दोष का खुलासा किया और आखिरकार उन्हें उस भूमि से जाना पड़ा जिसपर उन्होंने सदियों तक शासन करने की आशा की थी।

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